इन जगहों का जिक्र रामायण में भी है

इन जगहों का जिक्र रामायण में भी है। इस रिपोर्ट को अपने रीडर्स तक पहुंचाने के लिए हमारे रिपोर्टर्स इन सभी 8 जगहों पर गए। उस दौर के साक्ष्यों को तलाशा। उनसे जुड़ी मान्यताओं और कहानियों की पड़ताल की। तस्वीरें कलेक्ट की। साथ ही इन जानकारियों को वहां के महंतों, इतिहासकारों और रामायण-वेद के जानकारों से क्रॉस चेक किया। इस सबका उद्देश्य पाठकों तक रावण के मारे जाने के बाद से 7090 साल पहले मनी पहली दिवाली की पूरी जानकारी पहुंचाना है…।

बता दें, इस रिपोर्ट में दी गईं डेट्स इंडियन गर्वनमेंट के साइंस मिनिस्ट्री से मान्यता प्राप्त ‘इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदाज’ (आईसर्व) के रिसर्च में सामने आईं। इन्हें रामायण में लिखे उस दौर के ग्रहों, नक्षत्रों, तारामंडलों की स्‍थिति के आधार पर नासा के वेद स्पेशल ‘प्लेटिनम गोल्ड’ सॉफ्टवेयर से निकाला गया है। आईसर्व डायरेक्टर सरोज बाला से बातचीत में कहा, “आज से 7089 साल पहले 4 दिसंबर 5076 BC को राम ने रावण का वध किया था। अलग-अलग जगह रुकते हुए वे 29वें दिन 2 जनवरी 5075 BC को वापस अयोध्या पहुंचे थे।”
कंटेंट सोर्स: वाल्मीकि रामायण, तुलसीदास का रामचरित मानस, उत्तर रामायण, पद्य पुराण, कम्ब रामायण, इंडियन गर्वनमेंट के साइंस मिनिस्ट्री से मान्यता प्राप्त ‘इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदाज’ की डायरेक्टर डॉ. सरोज बाला, रामायण तिथियों की गणना के लिए नासा द्वारा बनाया गया वेद-नक्षत्र आधारित सॉफ्टवेयर ‘प्लेटिनम गोल्ड’, रामेश्वर के रामतीर्थम् के महंत के. पणभदास, भारद्वाज आश्रम के अधिकारी, तीर्थ पुरोहित समाज संघ श्रृंगवेरपुर धाम प्रयाग के अध्यक्ष, रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सतेंद्र दास और इंटरनेशनल रामायण रिसर्च सेंटर।
नोट: ये रिपोर्ट रामायण और ऊपर दिए गए कंटेंट सोर्स पर आधारित है।

पहला पड़ाव: गन्धमादन पर्वत और अग्नितीर्थ, रामेश्वरम

– लंका से अयोध्या के लिए उड़ा रामजी का पुष्पक विमान रामेश्वरम के गंधमादन पर्वत पर उतरा। आज यहां राम पादनम मंदिर है।
– मान्यता है कि रावण जैसे ब्राह्मण को मारने से राम पर ब्रह्महत्या का दोष लगा। इसे दूर करने के लिए वे अगस्तय और बाकी मुनियों से मिले।
– उनके बताए अनुसार राम-सीता सहित सब पैदल चलकर अग्नितीर्थ (गन्धमादन पर्वत से करीब 2 किमी दूरी पर समुद्र का किनारा) पहुंचे। यहां भगवान शिव की पूजा करनी थी।
टूट गई थी हनुमान की पूंछ
– पूजा करने के लिए राम ने हनुमान को कैलाश से शिवलिंग लाने को कहा। काफी देर होने के बाद भी हनुमान नहीं लौटे।
– मुहूर्त बीतता देख सीताजी ने गीली मिट्टी से शिवलिंग बनाकर राम के साथ पूजा शुरू कर दी।
– कुछ देर बाद हनुमान दोनों हाथों में शिवलिंग लेकर वापस आए। श्रीराम से इस शिवलिंग को स्थापित करने को कहा।
– जवाब में श्रीराम ने हनुमान से कहा कि जो शिवलिंग सीता ने लगाया है, उसे उखाड़ कर अपना वाला स्थापित कर दो।
– हनुमान अपनी पूंछ से सीता का बनाया शिवलिंग उखाड़ने लगे। उनकी पूंछ टूट गई, लेकिन शिवलिंग नहीं हिला। आज इस जगह पूंछहीन हनुमान का मंदिर है।
हनुमान और सीता, दोनों के शिवलिंग के बिना पूरी नहीं होगी पूजा
– रामेश्वर के रामतीर्थम् के महंत के. पणभदास के मुताबिक, हनुमान के असफल होने के बाद रामजी ने कैलाश से लाए शिवलिंग को पास में ही स्थापित कराया और कहा कि हनुमान के शिवलिंग की पूजा के बिना सीता के शिवलिंग की प्रार्थना पूरी नहीं मानी जाएगी।
आज क्या है यहां: जहां शिवलिंग स्थापित किया था, वहां राम पादनम मंदिर है। साथ में सीता तीर्थम और लक्ष्मण तीर्थम।

दूसरा पड़ाव: किष्किंधा नगरी, बेल्लारी, कर्नाटक

– आईसर्व डायरेक्टर सरोज बाला के मुताबिक, किष्किंधा नगरी के ऊपर से विमान के गुजरने पर रामजी ने सीता को बाली के वध और सुग्रीव की पीड़ा के बारे में बताया।
– इसे सुनकर सीताजी ने राम से सुग्रीव और अंगद की पत्नी को भी साथ अयोध्या ले चलने के लिए विनती की। इसके बाद श्रीराम ने विमान किष्किंधा में उतारा।
– सुग्रीव और अंगद की पत्नियों को साथ चलने के लिए तैयार कराया। फिर विश्राम कर वहां से आगे चले।
आज क्या है यहां: जहां विमान उतरा था, वहां पर पहले कुछ साक्ष्य मिले थे। हनुमान के मंदिर के साथ ही यहां सिर्फ सु्ग्रीव के राजतिलक की निशानी मिलती है।

तीसरा पड़ाव: कचनागिरी की तलहटी, कर्नाटक

– सु्ग्रीव और अंगद की पत्नियों को साथ लेकर विमान जैसे ही आगे बढ़ा तो हनुमान ने राम से कहा कि प्रभु यहीं पास में उनकी मां रहती है। बहुत दिन हुए मुलाकात किए। आज्ञा दें तो उनसे थोड़ी देर मिल लूं।
– जवाब में श्रीराम बोले, “हनुमान वो आपकी नहीं, हमारी और लक्ष्मण की भी माता हैं। हम भी उनसे मिलना चाहेंगे।”
– फिर सभी लोग मां अंजनी से मिले। वहां साथ भोजन किया। रात्रि विश्राम के बाद आगे बढ़े।
आज क्या है यहां: यंत्रोद्धारक हनुमान मंदिर बना है। इसमें पहले मां अंजनी की पूजा होती है।

चौथा पड़ाव: सुंदर दण्डकवन पंचवटी, नासिक

– किष्किंधा से पुष्पक विमान नासिक पहुंचा। यहां विमान उतरने को लेकर वाल्मीकि और बाकी रामायणों के मत अलग-अलग हैं।
– वाल्मीकि रामायण के मुताबिक नासिक के ऊपर पहुंचने पर राम ने विमान की गति धीमी की और नीचे की तरफ करके ऋषियों से आशीर्वाद लिया। उनसे बातचीत करके आगे बढ़ गए।
– इस बातचीत में रामजी ने सीता को बताया कि वो जो शोभाशाली पेड़ दिख रहा है, वहां जटायु तुम्हारी रक्षा करते हुए रावण के हाथों मारा गया था। उसके आगे केले के पत्तों से घिरा महर्षि अगस्त्य का आश्रम है।
– वहीं, तमिल और उत्तर रामायण में राम के यहां उतरने और सीता के साथ ऋषियों के आशीर्वाद लेने का जिक्र है।
आज क्या है यहां: अयोध्या वापसी का कोई खास प्रमाण नहीं, लेकिन लंका जाते समय का सीता कुंड और पंचवटी है।

5वां पड़ाव: ऋषि आश्रम, चित्रकूट

– नासिक के दण्डकवन से श्रीराम का पुष्पक विमान सीधे चित्रकूट आ गया।
– यहां रामजी ने सीता को लंका जाते समय के ऋषियों के आश्रम दिखाए।
– कुछ क्षण यहां रुककर सभी ने ऋषियों का आशीर्वाद लिया। फिर वहां से आगे बढ़ गए।
आज क्या है यहां: रुपौली वृक्ष जहां राम-सीता विश्राम करते थे। बाकी जाते समय के प्रमाण के तौर पर लक्ष्मण पहाड़ी और जानकी कुंड जैसे कई साक्ष्य दिखते हैं।

छठा पड़ाव: भारद्वाज आश्रम, इलाहाबाद

– लंका से अयोध्या की यात्रा में रामजी के पुष्पक विमान का अगला पड़ाव गंगा किनारे बना भारद्वाज आश्रम रहा।
– यहां विमान उतारने के पीछे माता सीता का भगवती गंगा नदी को दिया गया वचन कारण बना।
– भारद्वाज आश्रम के पुजारी करुणानिधि नाथ गोस्वामी ने बताया कि वनवास के दौरान यहां रुककर सीताजी ने गंगा से विनती की थी कि अगर रामजी, लक्ष्मण सहित वो सकुशल वनवास से अयोध्या लौंटेगी तो यहां रुककर पहले पूजा-अर्चना करेंगी।
– इस वचन को पूरा करने के लिए पुष्पक विमान यहां उतरा। गंगा स्नान और पूजा के बाद सभी भारद्वाज आश्रम गए।
हनुमान पहले ही पहुंच गए थे अयोध्या
– यहां विमान उतारते ही श्रीराम ने हनुमान को अयोध्या जाकर भरत से उनकी वापसी की बात बताने को कहा। हनुमान ये समाचार लेकर अयोध्या के नंदीग्राम चले गए।
– तब तक राम, सीता सहित बाकी सेना कुछ दिन आश्रम में ही रुके। फिर भारद्वाज ऋषि से आशीर्वाद ले विमान वहां से निकल गया।
आज क्या है यहां: भारद्वाज आश्रम है। वहां इस पड़ाव के कई साक्ष्य मौजूद हैं।

7वां पड़ाव: गंगा के उस पार नाविक का घर, इलाहाबाद

– जब नाविक निषादराज को श्रीराम के वापस आने का पता चला वो फटाफट नाव से गंगा के दूसरे छोर पहुंच गया।
– निषाद से मिलने के लिए दूसरे छोर पर विमान वापस रोका गया। श्रीराम ने उसे गले लगाया और साथ अयोध्या चलने को कहा।
– बता दें, निषाद के लिए रामजी को इसलिए रुकना पड़ा, क्योंकि जाते वक्त इसी नाविक ने उन्हें गंगा नदी पार कराया था। तब इसके लिए उसने श्रीराम से कोई उतरवाई नहीं ली थी।
– इसके बदले निषाद ने कहा था कि जब आप वापस आएंगे, तब मुलाकात कीजिएगा।
आज यहां क्या है: गंगा इस जगह से 3 किमी आगे बह रही है। इसलिए वर्तमान में कोई साक्ष्य नहीं दिखता। पुरातत्व विभाग की खुदाई में इस मुलाकात के कुछ साक्ष्य जरूर मिले थे। फिर यहां निषादराज घाट बना दिया गया।

8वां पड़ाव: नंदीग्राम, अयोध्या

– निषाद को साथ लेकर श्रीराम का विमान नंदीग्राम पहुंचा।
– यहां हनुमान द्वारा पहले से भरत को दी सूचना के चलते काफी लोग पुष्पक विमान का इंतजार कर रहे थे।
– रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सतेंद्र दास के मुताबिक, विमान नंदीग्राम के मुख्य द्वार पहुंचा। वहां भरत और बाकी लोग पहले से ही स्वागत के लिए थे।
– भरत दौड़कर भाई के गले लगे और दोनों के आंखों में आंसू आ गए।
हाथ में खड़ाऊं ले चले भरत, तब मनी थी पहली दिवाली
– मिलाप के बाद भरत रामजी की खड़ाऊं हाथ में ले रथ पर बैठकर अयोध्या नगरी के अंदर चल दिए।
– यहां चारों तरफ दीपक जल रहे थे। जगह-जगह उनका अभिषेक हुआ। आरती हुई। पूरा रास्ता फूलों से पटा था। लोग खुशी के मारे नाच-गा रहे थे। दिवाली मना रहे थे।
– ये दुनिया की पहली दिवाली थी। तब से आज तक हर साल ये त्योहार धूमधाम से मन रहा है।
आज क्या है यहां: भरत कुण्ड, जहां श्रीराम की वापसी की सूचना हनुमान से मिलने पर भरत ने उन्हें जोर से गले लगा लिया था। यहां गले मिलते हुए मूर्ति भी है।